कर्माधिन
कर्माधिन
कितना ख़ौफ है इस जमाने के सौन्दर्य में,
गम भी यहाँ हँसते रहते हैं बहारों में।
कितने हसीन ख्वाब सजाये बैठे हैं लोग,
निराशा के बलबूते पर यहाँ खड़े हैं लोग।
कितनी दुवाँये करते हैं उस रब से,
आज भी लोग मरते हैं इन्तजार में।
कितने दिन कटते रहे इस दुनिया में,
जीने की वजह खो बैठे हैं खोजने में।
कितना डरते हैं हम सब भगवान से,
हमारा घड़ा बस भर गया है पापों से।
कितना इन्तजार करते हैं कल के सुखों का,
कौन हिसाब रखता हैं कल के कर्मो का।
-दिशिता भट्ट
गम भी यहाँ हँसते रहते हैं बहारों में।
कितने हसीन ख्वाब सजाये बैठे हैं लोग,
निराशा के बलबूते पर यहाँ खड़े हैं लोग।
कितनी दुवाँये करते हैं उस रब से,
आज भी लोग मरते हैं इन्तजार में।
कितने दिन कटते रहे इस दुनिया में,
जीने की वजह खो बैठे हैं खोजने में।
कितना डरते हैं हम सब भगवान से,
हमारा घड़ा बस भर गया है पापों से।
कितना इन्तजार करते हैं कल के सुखों का,
कौन हिसाब रखता हैं कल के कर्मो का।
-दिशिता भट्ट
Nice one .keep it up.
ReplyDeleteहोढो पे हसी है
आंखो मे दर्द सोया है
जमाने को क्या मालूम
हसनेवाला कितना रोया हे
Heart touching words
ReplyDeleteToo good
Keep it up..👍👍
Nice one
ReplyDeleteYou've Improved!
Keep It Up!
So beautiful poem . Specifically i would like title . We depend on KARMA . 👍
ReplyDeleteSo beautiful poem . Specifically i would like title . We depend on KARMA . 👍
ReplyDeleteWell said...! #Truth
ReplyDelete