कर्माधिन
कर्माधिन कितना ख़ौफ है इस जमाने के सौन्दर्य में, गम भी यहाँ हँसते रहते हैं बहारों में। कितने हसीन ख्वाब सजाये बैठे हैं लोग, निराशा के बलबूते पर यहाँ खड़े हैं लोग। कितनी दुवाँये करते हैं उस रब से, आज भी लोग मरते हैं इन्तजार में। कितने दिन कटते रहे इस दुनिया में, जीने की वजह खो बैठे हैं खोजने में। कितना डरते हैं हम सब भगवान से, हमारा घड़ा बस भर गया है पापों से। कितना इन्तजार करते हैं कल के सुखों का, कौन हिसाब रखता हैं कल के कर्मो का। -दिशिता भट्ट