ख्वाब के अंधेरों मे..
ख्वाब के अंधेरों मे.. अब क्या कहु वो रात के बारे मे, जब उजाले के ख्वाब थे आँखों मे। हवा के झोंके से चली गई सब यादें, एक तूफ़ान आया और काँप उठी मैं। कहना भी तो क्या वो आसमान से, जो खड़ा नहीं है खुद की ज़मीन मे चमकते तारे भी अब कम होने लगे है, आखिर कौन बचाए उनको टूट ने से। हैरान हो गई चांद के ना मिलने से, पर भलाई है अंधेरों से दोस्ती करने मे। -दिशिता भट्ट