रहगुज़र जिंदगी का
इतने ख़फ़ा क्यूँ हो जिंदगी से ये कौन सी दोबारा आने वाली है। अजनबी क्यूँ बनते हो जिंदगी से वाकेफ रहो, साथ जाने वाली है। अगर समझना है इस जिंदगी को तो ये हक़ीक़त समझाने वाली है। खामोशी से क्यूँ देख रहे हों जिंदगी को वक़्त की शिकायतें शोर करने वाली है। मुश्किल तो होगा रहगुज़र जिंदगी का आसान कहां ख्वाहिशें होने वाली है। - दिशिता भट्ट