वक़्त
वक़्त
31st December, 2019
कुछ यूँही साल गुज़रे! कुछ यूँही वक़्त गया,
आते-जाते लोगों से ! कुछ यूँही साथ छुटा।
अब तक तुम रफ़्तार से मुझे छोड़ के गुज़रे हो,
ओ ! मेरे वक़्त क्या यार तुम भी पराये लगते हो।
मैं कटघरे में खड़ा हूं! तुम कहो अपराध मेरा,
क्यूँ कुछ नहीं बोलता? क्या यही हाल है तेरा?
बहुत दूर से देखा है! हसीन लगते हो तुम,
पास आकर बता! किस हाल में हो तुम?
पुराने जख्मो के साथ नईं उम्मीदे होंगी,
अच्छे वक़्त की हमें भी जल्दी होगी।
दिशिता भट्ट
Great combination of word and situation..👌
ReplyDeleteकवयित्रीजी को "अच्छे वक़्त" की शुभकामनाए...
ReplyDelete-अतिसुंदर
क्या कविता है । मुझे एक शेर याद आता है
ReplyDeleteइश्क ने हमें निकमा कर दिया वरना इंसान हम भी थे काम के।
👌🏻👌🏻
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